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भगंदर रोग (Fistula) क्या है: कारण, लक्षण और लेज़र इलाज

25 August CBLMHFH Medical Team Medically Reviewed
भगंदर रोग (Fistula) क्या है: कारण, लक्षण और लेज़र इलाज

चिकित्सकीय समीक्षा: डॉ. पंकज अग्रवाल, CBLM Holy Family Hospital, जयपुर

संक्षिप्त उत्तर

भगंदर रोग क्या है? भगंदर, जिसे अंग्रेज़ी में fistula in ano कहते हैं, वह स्थिति है जिसमें गुदा के अंदर से लेकर बाहर की चमड़ी तक एक पतली सुरंग बन जाती है और उससे लगातार मवाद रिसता रहता है। यह गुदा की ग्रंथि में हुए संक्रमण से शुरू होता है। सबसे ज़रूरी बात यह है कि यह सुरंग दवा से बंद नहीं होती, और अपने आप भी नहीं भरती। इसे बंद करने के लिए कोई न कोई प्रक्रिया करनी ही पड़ती है, चाहे वह लेज़र हो, सर्जरी हो, या क्षार सूत्र।

भगंदर रोग क्या है, सीधी बात

गुदा के अंदर छोटी-छोटी ग्रंथियाँ होती हैं जिनका काम चिकनाहट बनाना है। कभी इनमें से कोई ग्रंथि बंद हो जाती है, उसमें बैक्टीरिया फँस जाते हैं, और वहाँ मवाद भर जाता है। इसे anal abscess या गुदा का फोड़ा कहते हैं।

अब दो में से एक बात होती है। या तो वह फोड़ा ठीक हो जाता है और किस्सा खत्म। या फिर मवाद अपने लिए बाहर निकलने का रास्ता खोद लेता है, चमड़ी फाड़कर बाहर आ जाता है, और पीछे एक खोखली नली छोड़ जाता है। वही नली भगंदर है।

अंदर वाले मुँह को internal opening कहते हैं, बाहर वाले को external opening, और बीच के रास्ते को tract। इलाज का पूरा खेल इसी बात पर टिका है कि यह tract कहाँ से कहाँ जा रहा है और गुदा की मांसपेशी को कितना काटता हुआ जा रहा है।

बवासीर, फिशर और भगंदर तीन अलग बीमारियाँ हैं

यह सबसे बड़ी गड़बड़ है और इसी पर सबसे कम लिखा गया है। तीनों गुदा की बीमारियाँ हैं, पर इलाज तीनों का अलग है। बवासीर का इलाज और फिशर का इलाज दोनों अलग पन्नों पर विस्तार से लिखे हैं।

अंतर का आधार बवासीर (Piles) फिशर (Fissure) भगंदर (Fistula)
असल में होता क्या है गुदा की नसें फूल जाती हैं चमड़ी कट जाती है एक सुरंग बन जाती है
बाहर क्या आता है खून, अक्सर बिना दर्द थोड़ा खून, बहुत दर्द मवाद या पीला रिसाव
दर्द कैसा आमतौर पर कम जलन जैसा, घंटों रहने वाला कभी-कभी, सूजन के साथ
कपड़ों पर दाग खून का बहुत कम हाँ, लगातार
पहचानने का सबसे आसान तरीका: खुद से पूछिए कि बाहर क्या आ रहा है। खून आ रहा है तो बवासीर। खून के साथ जलता दर्द है तो फिशर। मवाद या पीला रिसाव है और अंडरवियर पर दाग लगता है, तो भगंदर।

वह सवाल जो हर मरीज़ पूछना चाहता है: दोबारा तो नहीं होगा?

ईमानदार जवाब यह है कि हो सकता है, और बवासीर के मुकाबले भगंदर में यह आशंका कहीं ज़्यादा रहती है। यही इस बीमारी की सबसे बड़ी दिक्कत है और यही वह बात है जो ज़्यादातर वेबसाइटें छुपा जाती हैं।

  1. अंदरूनी मुँह मिला ही नहीं। या गलत जगह ढूँढा गया। यह सबसे आम वजह है।
  2. कोई शाखा छूट गई क्योंकि MRI नहीं करवाया गया था।
  3. शुगर काबू में नहीं थी। बेकाबू शुगर में घाव भरना मुश्किल है।
  4. असली वजह टीबी थी और उसका इलाज नहीं हुआ।
  5. घाव की देखभाल ठीक से नहीं हुई। ऊपर से जल्दी बंद, नीचे खाली।

जयपुर में CBLM Holy Family Hospital पर हमारे पास जो मरीज़ आते हैं, उनमें एक बड़ी संख्या ऐसे लोगों की होती है जिनका पहले कहीं और ऑपरेशन हो चुका है। लगभग हर बार वजह इन्हीं पाँच में से कोई एक निकलती है, और सबसे ऊपर वाली दो सबसे आम हैं। इसीलिए हम पहले जांच पर वक़्त लगाते हैं, ऑपरेशन की तारीख बाद में देते हैं।

भगंदर होता किसे है

पहले फोड़ा हो चुका हो

सबसे आम शुरुआत यही है। गुदा में हुआ फोड़ा फूटने के बाद पीछे नली छोड़ जाता है।

डायबिटीज़

शुगर में संक्रमण जल्दी पकड़ता है और देर से जाता है। घाव भरने में भी दिक्कत आती है।

लंबी कब्ज़ और बैठे रहना

ड्राइवर, ऑफिस में घंटों कुर्सी पर बैठने वाले लोग और पुरानी कब्ज़ वाले मरीज़।

टीबी

भारत में यह भगंदर की एक असली वजह है और अक्सर छूट जाती है। बार-बार लौटने वाले भगंदर में इसकी जांच ज़रूरी है।

क्रोहन डिजीज़

आंत की यह बीमारी भगंदर बनाती भी है और उसे बार-बार लौटाती भी है।

मुश्किल प्रसव के बाद

जहाँ चीरा लगा हो या फटन हुई हो, वहाँ कभी-कभी बाद में भगंदर बन जाता है।

लक्षण जो लोग महीनों टालते रहते हैं

गुदा के आसपास एक छोटा सुराख या दाना, जिससे कुछ रिसता रहे। कपड़ों पर पीला या हल्का खूनी दाग। ध्यान रहे, अगर सुराख कमर के नीचे बीच वाली दरार में है, तो वह भगंदर नहीं बल्कि पाइलोनाइडल साइनस हो सकता है, जिसका इलाज अलग है। बैठने पर दर्द या भारीपन, जो टट्टी के बाद कुछ कम हो जाए। बदबू। और बीच-बीच में सूजन, जो कुछ दिन बढ़ती है, फिर फूटकर आराम देती है, और फिर लौट आती है।

वह पैटर्न जो सब कुछ बता देता है: सूजन, फिर फूटना, फिर आराम, फिर वही चक्र। फोड़ा एक बार होता है। भगंदर बार-बार यही करता है। अगर यह चक्र दो बार से ज़्यादा दोहरा चुका है, तो वह फोड़ा नहीं है।

आपका भगंदर सिंपल है या कॉम्प्लेक्स

यहाँ से इलाज का रास्ता तय होता है, और ज़्यादातर लेख इस हिस्से को छूते भी नहीं। गुदा के चारों तरफ़ एक गोल मांसपेशी होती है जिसे sphincter कहते हैं। यही तय करती है कि आप टट्टी रोक पाएँगे या नहीं। नली इस मांसपेशी के जितने ज़्यादा हिस्से से गुज़रती है, ऑपरेशन उतना ही मुश्किल हो जाता है।

सिंपल भगंदर में एक ही सीधी नली होती है, वह मांसपेशी के निचले हिस्से से गुज़रती है, और बाहर एक ही सुराख होता है। इनके नतीजे अच्छे रहते हैं।

कॉम्प्लेक्स वह है जिसमें नली ऊपरी हिस्से से गुज़रे, या उसकी शाखाएँ निकल आई हों, या बाहर कई सुराख हों, या पहले एक ऑपरेशन फेल हो चुका हो। महिलाओं में सामने की तरफ़ का भगंदर हमेशा कॉम्प्लेक्स ही माना जाता है, नली छोटी हो तब भी।

एक चेतावनी: अगर कोई डॉक्टर जांच किए बिना ही ऑपरेशन की तारीख दे दे, तो एक बार रुकिए। सिंपल और कॉम्प्लेक्स का फर्क जाने बिना किया गया ऑपरेशन वही ऑपरेशन है जो दोबारा करवाना पड़ता है।

जांच में क्या होता है

डॉक्टर पहले हाथ से जांच करेगा और बाहरी सुराख देखेगा। अगर मामला साफ़ न हो, तो MRI फिस्टुलोग्राम करवाया जाता है। यही वह जांच है जो नली का पूरा नक्शा दिखाती है, बताती है कि वह मांसपेशी के किस हिस्से से गुज़र रही है, और कहीं कोई छिपी शाखा तो नहीं है।

बहुत से मरीज़ इस जांच पर पैसे खर्च करने से बचना चाहते हैं। यह बचत महंगी पड़ती है। छिपी शाखा छूट गई तो भगंदर लौटेगा, और दूसरा ऑपरेशन पहले वाले से महंगा भी होता है और मुश्किल भी।

बार-बार होने वाले भगंदर में खून की जांच, शुगर की जांच और ज़रूरत पड़ने पर टीबी की जांच भी होनी चाहिए।

भगंदर का इलाज, सारे रास्ते

दवा से भगंदर ठीक नहीं होता। एंटीबायोटिक मवाद और सूजन कम कर सकती है, दर्द में आराम दे सकती है, पर वह नली वहीं रहती है। दो हफ़्ते बाद फिर वही कहानी। नीचे दिए तरीके एनोरेक्टल सर्जरी विभाग में किए जाते हैं, और फिस्टुला सर्जरी का पूरा ब्यौरा अलग पन्ने पर है।

फिस्टुलोटॉमी

नली को खोलकर खुला छोड़ दिया जाता है ताकि वह नीचे से भरे। सिंपल भगंदर के लिए सबसे भरोसेमंद तरीका, पर इसमें मांसपेशी का कुछ हिस्सा कटता है।

फिस्टुलेक्टॉमी

पूरी नली काटकर निकाल दी जाती है। घाव बड़ा बनता है और भरने में ज़्यादा वक़्त लगता है।

लेज़र (FiLaC)

पतला लेज़र फाइबर नली में डालकर उसे अंदर से बंद कर दिया जाता है। मांसपेशी कटती नहीं, इसलिए काबू खोने का डर सबसे कम।

VAAFT

कैमरे वाली पतली दूरबीन से नली को अंदर से देखा और साफ़ किया जाता है। छिपी शाखाएँ ढूँढने में बहुत काम आता है।

सेटन

एक धागा नली में छोड़ दिया जाता है जो धीरे-धीरे रास्ता साफ़ करता है। महीनों लगते हैं, पर ऊँचे कॉम्प्लेक्स केस में सबसे समझदार रास्ता।

क्षार सूत्र

आयुर्वेद का तरीका, जिसमें दवा लगा धागा हर हफ़्ते बदला जाता है। वक़्त ज़्यादा लगता है, पर मांसपेशी बची रहती है।

लेज़र सबके लिए क्यों नहीं है

लेज़र का सबसे बड़ा फायदा यही है कि मांसपेशी नहीं कटती। ऑपरेशन छोटा होता है, ज़्यादातर मरीज़ उसी दिन या अगले दिन घर चले जाते हैं, और दर्द खुली सर्जरी के मुकाबले काफ़ी कम रहता है।

बात का दूसरा पहलू भी सुन लीजिए। बहुत चौड़ी नली, बहुत ज़्यादा मवाद, या कई शाखाओं वाले केस में अकेले लेज़र से काम नहीं चलता। जिस सर्जन के पास सिर्फ़ लेज़र का हथौड़ा है, उसे हर मरीज़ कील दिखेगा।

क्षार सूत्र पर ईमानदार बात

भगंदर सर्च करने वाले दस में से छह लोग किसी आयुर्वेदिक पेज पर पहुँचते हैं। उन्हें यह कहकर भगाना कि सब बकवास है, बेईमानी भी है और बेवकूफी भी।

सही बात यह है कि घरेलू नुस्खे भगंदर नहीं भरते, लेकिन क्षार सूत्र नुस्खा नहीं है। यह एक प्रक्रिया है, भारत में सरकारी और निजी दोनों जगह इस्तेमाल होती है, और फिस्टुला के लिए इसे मान्यता प्राप्त इलाज माना जाता है। इसकी असली कीमत वक़्त है, क्योंकि हफ़्ते-हफ़्ते अस्पताल के चक्कर लगाने पड़ते हैं। दिहाड़ी पर काम करने वाले के लिए यह मुश्किल है। मांसपेशी को लेकर बहुत चिंतित मरीज़ के लिए यह विचार करने लायक है।

क्या इसे टाला जा सकता है

नहीं।

यही पूरा जवाब है। नली बन चुकी है, और वह न सूखेगी, न भरेगी, न अपने आप बंद होगी। टालने से सिर्फ़ इतना होता है कि जो काम आज छोटा है, वह छह महीने बाद बड़ा हो जाता है।

भगंदर के ऑपरेशन का खर्च

भारत में भगंदर की लेज़र सर्जरी का खर्च आम तौर पर चालीस हज़ार रुपये के आसपास बताया जाता है, हालाँकि यह शहर, अस्पताल और केस की पेचीदगी पर काफ़ी बदलता है।

फर्क चार चीज़ों से पड़ता है। केस सिंपल है या कॉम्प्लेक्स। MRI करवाना पड़ा या नहीं। एनेस्थीसिया जनरल लगा या स्पाइनल। और भर्ती कितने दिन रहनी पड़ी, जो लेज़र में आमतौर पर एक दिन होती है और खुली सर्जरी में उससे ज़्यादा।

एक सवाल पूछकर जाइए: कोटेशन में MRI, दवाएँ और फॉलो-अप की ड्रेसिंग शामिल है या नहीं। बहुत सी जगह ये अलग से जुड़ते हैं और आखिरी बिल अंदाज़े से बड़ा निकलता है। बीमा है तो कैशलेस सुविधा के बारे में पहले ही पूछ लीजिए।

RGHS और चिरंजीवी योजना में कवर होता है या नहीं

राजस्थान के मरीज़ों के लिए यह सबसे काम की बात है और किसी लेख में मिलती नहीं। RGHS और मुख्यमंत्री चिरंजीवी योजना, दोनों में सर्जिकल पैकेज आते हैं और भगंदर जैसी सर्जरी इनके दायरे में आती है। CBLM Holy Family Hospital दोनों योजनाओं में empanelled है।

पर पैकेज कोड और उसमें क्या-क्या शामिल है, यह बदलता रहता है। इसलिए भर्ती होने से पहले अस्पताल के काउंटर पर अपना कार्ड दिखाकर लिखित में पुष्टि करवा लीजिए कि आपका केस किस पैकेज में जाएगा और कितना हिस्सा आपको देना होगा। ज़ुबानी हाँ पर भरोसा मत कीजिए।

ऑपरेशन वाले दिन असल में होता क्या है

सुबह खाली पेट आना होता है। भर्ती के कागज़, फिर एनेस्थीसिया वाले डॉक्टर से बात, जिसमें वह पूछेंगे कि कोई दवा चल रही है क्या और पहले कभी बेहोशी की दवा से दिक्कत हुई है क्या। सच बताइए, यही वह जगह है जहाँ छुपाई गई बात बाद में महंगी पड़ती है।

ज़्यादातर भगंदर के ऑपरेशन स्पाइनल एनेस्थीसिया में होते हैं, यानी कमर में इंजेक्शन और कमर से नीचे सुन्न। आप जागते रहते हैं। लेज़र वाला हिस्सा आधे घंटे से कम चलता है।

होश आने के बाद कुछ घंटे लेटे रहना पड़ता है क्योंकि स्पाइनल के बाद तुरंत खड़ा होना ठीक नहीं। शाम तक ज़्यादातर मरीज़ खुद चलकर बाथरूम जाते हैं। पहली टट्टी अगले दिन या उसके बाद आती है, और वह डरावनी नहीं होती, बशर्ते आपने पानी और फाइबर वाली सलाह मानी हो।

ऑपरेशन के बाद के हफ़्ते

लेज़र सर्जरी के बाद ज़्यादातर मरीज़ चौबीस घंटे में घर चले जाते हैं और दो-तीन दिन में हल्का-फुल्का काम शुरू कर देते हैं। भर्ती के समय क्या साथ लाना है, यह भर्ती प्रक्रिया वाले पन्ने पर लिखा है। घाव पूरा भरने में आम तौर पर चार से छह हफ़्ते लगते हैं। खुली सर्जरी में इससे ज़्यादा वक़्त लगता है।

  1. सिट्ज़ बाथ। गुनगुने पानी के टब में दस से पंद्रह मिनट, दिन में दो बार और हर टट्टी के बाद। सबसे कम ग्लैमरस सलाह, सबसे ज़्यादा असरदार।
  2. टट्टी नरम रखें। फाइबर, पानी, और ज़रूरत हो तो डॉक्टर की बताई दवा। ऑपरेशन के बाद ज़ोर लगाना सबसे बड़ी गलती है।
  3. ड्रेसिंग वैसे ही करवाएँ जैसे बताया गया है, चाहे लगे कि सब ठीक हो गया है। घाव नीचे से ऊपर की तरफ़ भरता है।
  4. शुगर काबू में रखें। यह दोबारा होने की सबसे रोकी जा सकने वाली वजह है।
  5. कुछ हफ़्ते बाइक और साइकिल से दूरी। सीट का दबाव सीधे उसी जगह पड़ता है।

घरेलू इलाज से क्या होता है और क्या नहीं

सिट्ज़ बाथ से आराम मिलता है और सफ़ाई बनी रहती है। हल्दी, नीम और त्रिफला जैसी चीज़ों से किसी को नुकसान नहीं होता। खाने में फाइबर बढ़ाना और पानी ज़्यादा पीना दोनों काम के हैं, क्योंकि कब्ज़ हालत बिगाड़ती है।

पर इनमें से कोई चीज़ नली को बंद नहीं करती। भगंदर एक रास्ता है जो बन चुका है। ऊपर लिखी चीज़ें उस रास्ते को साफ़ और कम तकलीफ़देह रख सकती हैं। बंद वही करेगा जो उस रास्ते तक पहुँचकर उसे बंद करे।

छह महीने नुस्खों में लगाने का असली नुकसान: वक़्त जाना नहीं है। नुकसान यह है कि इस दौरान सिंपल भगंदर कॉम्प्लेक्स बन जाता है, नई शाखाएँ निकल आती हैं, और जो ऑपरेशन तीस मिनट में हो जाता, वह अब बड़ा और महँगा हो चुका होता है।

महिलाओं में भगंदर अलग क्यों है

इस पर लगभग कोई नहीं लिखता, और लिखना चाहिए। महिलाओं में भगंदर मर्दों से कम होता है, पर जब होता है तो अक्सर सामने की तरफ़। सामने वाले हिस्से में मांसपेशी की परत पतली होती है, और यही बात इलाज को बदल देती है। जो ऑपरेशन पीछे की तरफ़ सुरक्षित है, वही सामने की तरफ़ जोखिम भरा हो जाता है।

दूसरी बात प्रसव से जुड़ी है। मुश्किल डिलीवरी के बाद, खासकर जहाँ चीरा लगा हो या फटन हुई हो, वहाँ कभी-कभी बाद में भगंदर बन जाता है। कई महिलाएँ इसे प्रसव के बाद की सामान्य तकलीफ़ समझकर महीनों निकाल देती हैं।

तीसरी बात सबसे ज़्यादा वक़्त बर्बाद करवाती है। सामने वाले भगंदर को कई बार स्त्री रोग की समस्या समझ लिया जाता है और मरीज़ गायनी और सर्जन के बीच घूमती रहती है। अगर रिसाव गुदा के पास से हो रहा है, तो जांच की सही जगह सर्जन के पास है।

सर्जन से ये चार सवाल ज़रूर पूछिए

मेरा भगंदर सिंपल है या कॉम्प्लेक्स?

जवाब में जांच का ज़िक्र आना चाहिए, सिर्फ़ देखकर बताई गई राय नहीं।

अंदरूनी मुँह कहाँ है?

अगर सर्जन को यह नहीं पता, तो ऑपरेशन की तारीख अभी नहीं आनी चाहिए।

कौन सा तरीका और क्यों?

अगर हर मरीज़ के लिए जवाब एक ही है, तो वह तरीका आपके लिए नहीं चुना गया।

अगर दोबारा हो गया तो?

ईमानदार सर्जन इस सवाल पर असहज नहीं होगा। वह बताएगा कि आपके केस में आशंका कितनी है।

भगंदर का इलाज टाल रहे हैं?

CBLM Holy Family Hospital, जयपुर में लेज़र फिस्टुला सर्जरी, MRI फिस्टुलोग्राम और अनुभवी सर्जन उपलब्ध हैं। RGHS और चिरंजीवी योजना दोनों स्वीकार्य हैं। आते समय पुरानी रिपोर्ट और पहले हुए ऑपरेशन का ब्यौरा साथ लाएँ।

मरीज़ पूछताछ भेजें

भगंदर से जुड़े आम सवाल

भगंदर को इंग्लिश में क्या कहते हैं?

Fistula in ano, या आम बोलचाल में anal fistula। यह गुदा की ग्रंथि में संक्रमण से बनी एक नली होती है।

क्या भगंदर दवा से ठीक हो सकता है?

नहीं। एंटीबायोटिक से मवाद और सूजन कम होती है और दर्द में आराम मिलता है, पर नली बंद नहीं होती। नली बंद करने के लिए कोई न कोई प्रक्रिया करनी ही पड़ती है।

भगंदर और बवासीर में क्या फर्क है?

बवासीर में गुदा की नसें फूलती हैं और आम तौर पर खून आता है। भगंदर में एक नली बन जाती है जिससे मवाद रिसता है। दोनों का इलाज पूरी तरह अलग है।

लेज़र सर्जरी में कितना समय लगता है?

ऑपरेशन आम तौर पर आधे घंटे से कम का होता है और ज़्यादातर मरीज़ चौबीस घंटे में घर चले जाते हैं। घाव पूरा भरने में चार से छह हफ़्ते लगते हैं।

क्या ऑपरेशन के बाद टट्टी पर काबू चला जाता है?

यह डर वाजिब है और यही वजह है कि नली की जगह जानना ज़रूरी है। लेज़र में मांसपेशी कटती नहीं, इसलिए इसमें यह जोखिम सबसे कम रहता है। ऊँचे कॉम्प्लेक्स भगंदर में सर्जन का चुनाव सबसे ज़्यादा मायने रखता है।

भगंदर दोबारा क्यों हो जाता है?

सबसे आम वजहें हैं अंदरूनी मुँह का न मिलना, कोई शाखा छूट जाना, बेकाबू शुगर, बिना पहचानी गई टीबी, और घाव की गलत देखभाल। इनमें से ज़्यादातर से पहले से बचा जा सकता है।

क्या MRI करवाना ज़रूरी है?

सिंपल केस में हमेशा नहीं। कॉम्प्लेक्स केस में, या जब पहले ऑपरेशन फेल हो चुका हो, MRI फिस्टुलोग्राम के बिना ऑपरेशन करना अंधेरे में तीर चलाना है।

क्या भगंदर कैंसर बन सकता है?

बहुत पुराने और सालों से चले आ रहे भगंदर में यह आशंका रहती है, हालाँकि ऐसा होना दुर्लभ है। सालों तक टालना इसीलिए ठीक नहीं।

क्या क्षार सूत्र लेज़र से बेहतर है?

दोनों की अपनी जगह है। क्षार सूत्र में हफ़्तों लगते हैं और बार-बार अस्पताल आना पड़ता है, पर मांसपेशी बचती है। लेज़र तेज़ है और तकलीफ़ कम देता है, पर हर तरह के भगंदर में अकेले काम नहीं करता। फैसला इस बात से होना चाहिए कि आपकी नली कहाँ है।

भगंदर के ऑपरेशन में कितना खर्च आता है?

भारत में लेज़र सर्जरी का खर्च आम तौर पर चालीस हज़ार रुपये के आसपास बताया जाता है, जो केस की पेचीदगी, MRI, एनेस्थीसिया और भर्ती के दिनों पर बदलता है। RGHS और चिरंजीवी योजना के तहत यह कवर हो सकता है।

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